क्रांतिकारी bhagat singh भगत सिंह का जीवन परिचय

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भगत सिंह का परिचय

इतिहास के महान क्रांतिकारियों के नाम के साथ BHAGAT SINGH का नाम लिया जाता है। बचपन से ही भगत सिंह अंग्रेजी हुकूमत को उखाड़ फेकने की चाह रखते थे जिसको उन्होंने बखूबी साकार किया है। लायलपुर जिले के बंगा में जन्मे भगत सिंह के अंदर बचपन से ही आजादी का जूनून सवार था। आपको बता दे कि, यह स्थान पर PAKISTAN का हिस्सा है। BHAGAT SINGH का जन्म 28 सितंबर 1907 को हुआ था। उस समय हर भारतीय की तरह भगत सिंह का परिवार भी आजादी का पैरोकार था। उनके चाचा अजीत सिंह और श्वान सिंह भी आजाद होने की राह देख रहे थे और करतार सिंह सराभा के नेतृत्व में GADAR पार्टी के MEMBER थे।

जलियांवाला बाग कांड के बाद आया मोड़

13 अप्रैल 1919 को हुए जलियांवाला बाग हत्याकांड की वजह से BHAGAT SINGH पर गहरा प्रभाव पड़ा। जिसके बाद भगत सिंह ने LAHORE के NATIONAL COLLEGE की पढ़ाई छोड़कर 1920 में MAHATMA GANDHI के अहिंसा आंदोलन में भाग लिया। इस आंदोलन में गांधी जी विदेशी समानों का बहिष्कार कर रहे थे। इससे प्रभावित होकर 14 साल के BHAGAT SINGH ने सरकारी स्‍कूलों की पुस्‍तकें और कपड़े जला दिए। इसके बाद इनके पोस्‍टर गांवों में छपने लगे।

चोरी-चोरा हत्याकांड

आपको बता दें कि, भगत सिंह पहले महात्‍मा गांधी के आंदोलन और भारतीय नेशनल कॉन्फ्रेंस के MEMBER थे। लेकिन सन 1921 में चौरा-चोरी हत्‍याकांड के बाद गांधीजी ने जब किसानों का साथ नहीं दिया तो भगत सिंह पर उसका गहरा प्रभाव पड़ा। जिसके बाद वे CHANDRA SHEKHAR AZAD के द्वारा गठित की गई गदर दल के हिस्‍सा बन गए।

काकोरी कांड

BHAGAT SINGH ने CHANDRA SHEKHAR AZAD के साथ मिलकर अंग्रेजों के खिलाफ आंदोलन शुरू किया। इस दौरान 9 अगस्त, 1925 को एक लूट हुई। दरअसल शाहजहांपुर से लखनऊ के लिए चली 8 नंबर डाउन पैसेंजर से एक छोटे से STATION “KAKORI” से सरकारी खजाने को लूट लिया गया। जिसके बाद यह घटना KAKORI KAND नाम से इतिहास के पन्नों में लिखी गई। इस कांड के पीछे अंजाम भगत सिंह, रामप्रसाद बिस्मिल, चंद्रशेखर आजाद और प्रमुख क्रांतिकारियों ने साथ मिलकर अंजाम दिया था।

वहीं KAKORI KAND के बाद अंग्रेजों ने HINDUSTAN REPUBLIC ASSOCIATION के क्रांतिकारियों की अपनी हरकतों में रफ़्तार पकड़ ली और जगह-जगह अपने AGENTS को तैनात कर दिया। इस बीच BHAGAT SINGH और SUKHDEV लाहौर पहुंचे। जहां उनके चाचा सरदार किशन सिंह ने कहा कि अब यहीं रहो और दूध का कारोबार करो।

कुछ समय तक देखा काम-काज

उनके चाचा भगत सिंह की शादी कराना चाहते थे और एक बार लड़की वालों को भी लेकर पहुंचे थे। वहीं दूसरी ओर BHAGAT SINGH का कामकाज में मन नहीं लग रहा था वे काम तो कर रहे थे लेकिन जब भगत सिंह कागज-पेंसिल ले दूध का हिसाब करते, तो हिसाब कभी सही नहीं मिलता। SUKHDEV खुद ढेर सारा दूध पी जाते और दूसरों को भी मुफ्त पिलाते। आपको यह भी बताते चले कि, भगत सिंह को फिल्में देखने का और रसगुल्ले खाने का बहुत शौक था। उन्हें जब भी मौका मिलता था तो राजगुरु और यशपाल के साथ फिल्म देखने चले जाते थे। वह दौर CHARLIE CHAPLIN का था और उनके एक दीवाने भगत सिंह भी थे। लेकिन इस बात पर CHANDRA SHEKHAR AZAD बहुत गुस्सा होते थे।

कई देशों की क्रांति के बारे में किया था अध्ययन

भगत सिंह कई नामों से जाने जाते है कई लोग उन्हें क्रांतिकारी बोलते है तो कुछ उन्हें देशभक्त का नाम देते है। BHAGAT SINGH इन सब के साथ-साथ एक अध्ययनशीरल विचारक, कलम के धनी, दार्शनिक, चिंतक, लेखक, पत्रकार और महान मनुष्य भी थे। उन्होंने महज 23 वर्ष की उम्र में फ्रांस, आयरलैंड और रूस की क्रांति का अध्ययन किया था। साथ ही वे हिन्दी, उर्दू, अंग्रेजी, संस्कृत, पंजाबी, बंगला और आयरिश भाषा के चिंतक और विचारक भी थे। इसके साथ-साथ भगत सिंह एक अच्छे वक्ता, पाठक और लेखक भी थे। उन्होंने ‘अकाली’ और ‘कीर्ति’ दो अखबारों का संपादन भी किया था।

जेल में बिताए 2 साल

BHAGAT SINGH ने अपने जीवन के दो साल जेल में भी बिताए है। लेकिन उन्होंने इस कठिन समय का भी बखूबी इस्तेमाल किया। आपको बता दें कि, जब वे जेल की सलाखों के पीछे थे तब उन्होंने लेख लिखकर अपने क्रांतिकारी विचार व्यक्त किए। जेल की कठिन परिस्थितियों में भी उनका अध्ययन बराबर जारी रहा। अपने लेखों में उन्होंने लिखा था कि मजदूरों का शोषण करने वाला चाहें एक भारतीय ही क्यों न हो, वह मेरा शत्रु है। इन दो सालों में उन्होंने अंग्रेज़ी में एक लेख भी लिखा था जिसका शीर्षक था ‘मैं नास्तिक क्यों हूं’? इतना ही नहीं BHAGAT SINGH और उनके साथियों ने जेल में 64 दिनों की भूख हड़ताल की थी। इस दौरान उनके एक साथी यतीन्द्रनाथ दास ने अपने प्राण ही त्याग दिए थे।

फाँसी

आखिरकार 26 अगस्त, 1930 को अदालत ने BHAGAT SINGH को भारतीय दंड संहिता की धारा 129, 302 तथा विस्फोटक पदार्थ अधिनियम की धारा 4 और 6एफ तथा आईपीसी की धारा 120 के तहत अपराधी घोषित कर किया। जिसके बाद 7 अक्टूबर, 1930 को अदालत ने 68 पृष्ठों का निर्णय दिया, जिसमें भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फाँसी की सजा सुनाई गई। फाँसी की सजा सुनाए जाने के साथ ही लाहौर में धारा 144 लगा दी गई।

जिसके बाद 23 मार्च 1931 को शाम में करीब 7 बजकर 33 मिनट पर BHAGAT SINGH और SUKHDEV व RAJGURU को फाँसी दे दी गई। फाँसी पर जाने से पहले वे लेनिन की जीवनी पढ़ रहे थे और जब उनसे उनकी आखरी इच्छा पूछी गई तो उन्होंने कहा कि वह लेनिन की जीवनी पढ़ रहे थे और उन्हें वह पूरी करने का समय दिया जाए। बता दें कि जेल के अधिकारियों ने जब उन्हें सूचना दी थी कि उनके फाँसी का वक्त आ गया है। तो उन्होंने कहा था कि, “ठहरिए! पहले एक क्रान्तिकारी दूसरे से मिल तो ले।” फिर एक मिनट बाद किताब छत की ओर उछाल कर बोले – “ठीक है अब चलो।”

फाँसी पर जाते समय वे तीनों मस्ती से गा रहे थे –

मेरा रँग दे बसन्ती चोला, मेरा रँग दे।
मेरा रँग दे बसन्ती चोला। माय रँग दे बसन्ती चोला॥

महान क्रांतिकारी शहीद भगत सिंह के पांच महान विचार

“क्या तुम्हें पता है कि दुनिया में सबसे बड़ा पाप गरीब होना है? गरीबी एक अभिशाप है, यह एक सजा है”

“राख का हर कण मेरी गर्मी से गतिमान है। मैं एक ऐसा पागल हूं जो जेल में भी आजाद है।”

“प्रेमी, पागल और कवि एक ही चीज से बने होते हैं।”

“जो भी विकास के लिए खड़ा है उसे हर चीज की आलोचना करनी होगी, उसमें अविश्वास करना होगा और उसे चुनौती देनी होगी।”

“मैं इस बात पर ज़ोर देता हूं कि मैं महत्वाकांक्षा, आशा और जीवन के प्रति आकर्षण से भरा हुआ हूं। पर मैं ज़रूरत पड़ने पर ये सब त्याग सकता हूं और वहीं सच्चा बलिदान है।”

नमस्कार दोस्तों, मैं Akanksha Jain Help2Help की Biography Author हूँ. Education की बात करूँ तो मैं Mass Communication से Graduate हूँ. मुझे Biography पढ़ना और दूसरों को पढ़ाना में बड़ा मज़ा आता है.

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